शास्त्र का प्रचारण और क़ुरान

न तो मुसलमान और न ही ईसाईयों के पास “असली पांडुलिपियाँ” हैं। “असली पांडुलिपियों” के होने से कोई चीज़ “ईश्वर का शब्द” नहीं हो जाता। इसी तरह, मानव निर्मित प्रतियां होने का अर्थ यह नहीं है कि यह “ईश्वर का शब्द” नहीं हो सकता। मुसलमानों को विश्वास नहीं है कि ईश्वर ने  मुहम्मद को क़ुरान की एक प्रति सौंपी है। ईसाईयों को विश्वास नहीं है कि यीशु ने नए टेस्टामेंट को लिखा था और अपने समर्थकों को सौंपा था।

ईश्वर के शब्द विभिन्न साधनों के माध्यम से फैलाए जाते हैं। कोई भी चीज़ “ईश्वर का शब्द” हो सकता है, भले ही वह फरिश्तों के मुंह से,  ईश्वरदूतों के मुंह से, ईश्वरदूतों की कलम से, लेखकों की प्रतियों आदि से आए। ईश्वर के शब्द बस उसकी सीधे तौर पर आवाज़ सुनने या उसके द्वारा लिखी गई चीज़ के पास होने से कहीं ज़्यादा है।

नया टेस्टामेंट मूल रूप से लिखी गई प्रतियों में निहित है। ये सभी प्रतियां एक दूसरे के साथ सहमत नहीं हैं। ईसाईयों के पास हज़ारों टुकड़ों और हस्तलिखित प्रतियों के रूप में असली प्रतियों का 100% हिस्सा है, लेकिन नए टेस्टामेंट का तकरीबन 2% हिस्सा है, जहाँ हमें चुनना पड़ता है कि असली लिखाई कौन-सी थी और कौन-सी नहीं थी। ये मामूली मतभेद हैं और यह समझना आवश्यक है कि यहाँ कोई बड़े ईसाई सिद्धांत दांव पर नहीं हैं। पाठ के इस 2%  हिस्से पर  निर्णय लेने को शाब्दिक आलोचना का विज्ञान कहा जाता है।

अगर कोई क़ुरान के शब्दों को बदलने की कोशिश करे तो आपको कैसे पता चलेगा? आप क़ुरान के उनके संस्करण की तुलना अन्य हस्तलिखित प्रतियों के साथ करेगें। निम्नलिखित उदाहरण लें। यह थोड़ा अत्यंत होगा मगर यह समझने में उपयोगी होगा कि क्यों असली प्रति के न होते हुए भी और प्रतियों में अंतर होने के बावजूद भी यह निर्धारित किया जा सकता है कि असली प्रति क्या कहती है।

 मान लिजिए कि आपकी चाची सैली ने एक सपना देखा जिसमें वह एक ऐसे अमृत का       नुस्खा सीख लेती हैं जो उनके यौवन को लगातार बनाए रखेगा। जब वह जागी, तो    कागज़ के एक टुकड़े पर वह निर्देश लिख लेती है और रसोई में अपना पहला गिलास       बनाने पहुँच जाती है। कुछ ही दिनों में उसका रूप बदल जाता है। “चाची सैली के गुप्त      सॉस” की दैनिक खुराक की वजह से सैली, उज्ज्वल यौवन का एक चित्र है।

सैली इतनी उत्साहित है कि उसने अपने हाथ से लिखे सॉस बनाने के विस्तृत निर्देशों को अपने तीन ब्रिज साथियों को भेज दिया (चाची सैली उस सदी की हैं जब कोई फोटोकॉपी या ईमेल नहीं था)। उन तीनों ने भी प्रतियां बनाकर अपने दस-दस दोस्तों को भेज दिया।

सब कुछ ठीक था कि एक दिन चाची सैली का पालतू कुत्ता नुस्खे की असली प्रति को खा गया। सैली बहुत परेशान हो गई। घबराहट में उसने अपने तीनों दोस्तों से संपर्क किया जिनके साथ रहस्यमय तरीके से वैसी ही दुर्घटनाएं हुई थीं। उनकी प्रतियां भी गई, इसलिए असली शब्दों को ढ़ूढ़ने की कोशिश में उनके दोस्तों से संपर्क किया गया।

अंततः सभी बची हुई हाथ से लिखी गई प्रतियां, संख्या में छब्बीस, को इकट्ठा किया गया। जब उन्हें रसोई घर की मेज़ पर फैलाया गया, तो तुरंत कुछ मतभेद देखे गए। तेईस प्रतियां बिल्कुल एक जैसी हैं। शेष तीन में से एक मे कुछ ग़लत लिखे गए शब्द हैं और एक में उल्टे किए गए वाक्यांश (“काटें फिर मिश्रित करें” की जगह है “मिश्रित करें फिर काटें”) और एक में एक ऐसी सामग्री है जो दूसरों की सूची में शामिल नहीं है।

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि चाची सैली असली नुस्खे को सही तरह से संगठित कर सकती है? बेशक वह कर सकती है। ग़लत लिखे गए शब्दों को आसानी से सही कर सकते हैं, एक उल्टा वाक्यांश सीधा किया जा सकता है और अतिरिक्त सामग्री को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

कई या विभिन्न रूपांतरों के साथ भी असली को सही मूलपाठ के प्रमाण के साथ अत्यधिक विश्वास के साथ पुनर्निर्मित किया जा सकता है। ग़लत लिखे गए शब्द स्पष्ट रूप से त्रुटियाँ हैं, उल्टे किए गए वाक्यांश साफ दिखेंगे और आसानी से सुधारे जा सकते हैं, और यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक प्रति में एक शब्द या वाक्य को छोड़ देना, उन्हें ग़लती से जोड़ देने से अधिक स्वीकार्य है।

सीधे तौर से, शाब्दिक आलोचना का विज्ञान ऐसे काम करता है (ग्रेगरी कूक्ल, “नए टेस्टामेंट के संशयवादियों के लिए तथ्य” – “फैक्ट्स फॉर स्केपटिक्स ऑफ द न्यू टेस्टामेंट).

हज़ार  रुपए के एक जाली नोट के संपूर्ण मुद्रण की तुलना में बेहतर है कि एक असली नोट का मुद्रण थोड़ा अपूर्ण हो। बुनियादी सवाल यह नहीं है कि ईसाईयों की प्रतियां थोड़ी अपूर्ण हैं या मुसलमानों की, बल्कि यह कि कौन-सा धर्म सही है और कौन-सा जाली है।

एक नोट का थोड़ा अपूर्ण होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि नोट जाली है। थोड़ा अपूर्ण नोट, जो जाली नहीं है, तब भी वैध मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। नए टेस्टामेंट के टुकड़ों और पांडुलिपियों के बीच अंतर इस बात का प्रमाण नहीं है कि यीशु की क्रूस पर मृत्यु जाली है और इसलिए उसे खारिज कर देना चाहिए।

लोगों ने नए टेस्टामेंट को परिवर्तित करने और भ्रष्ट करने का प्रयत्न किया है। लेकिन ईश्वर ने नए टेस्टामेंट को संरक्षित करने का एक तरीके यह इस्तेमाल किया है कि पांडुलिपियों की कई प्रतियां उपलब्ध कराई हैं। यह एकाधिक प्रतियाँ एकीकृत होकर यह पुष्टि करती हैं कि यीशु की मृत्यु क्रूस पर हुई; हम जानते हैं कि यह शिक्षण निश्चित रूप से असली है। मुसलमानों को यह प्रदर्शित करने की आवश्यकता नहीं है कि लोगों ने बाइबिल को बदलने की कोशिश की है। इस्लाम एक जीवित सबूत है कि लोगों ने बाइबिल को बदलने की कोशिश की है। बल्कि, मुसलमानों को पांडुलिपि सबूत से और/या इतिहास से यह प्रमाणित करने की आवश्यकता है कि इतिहास में पहले किसने नए टेस्टामेंट को बदलने की कोशिश की और बदल पाने में सफल रहा जिससे कि अब वह यह सिखाता है कि यीशु की मृत्यु क्रूस पर हुई । वे इस तरह के सबूत को पेश करने में असफल रहे हैं जिससे यह साबित होता है कि क़ुरान इसका जाली दावा है कि वह ईश्वर का शब्द है।

क्रूस पर यीशु की मृत्यु और क़ुरान