सूली पर यीशु की मृत्यु और कुरान

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बाइबल, कुरान और एक न्यायाधीश की तस्वीर के बारे में कहा गया है कि एक फैसला जिसके बारे में सच है।

सूली पे यीशु की मृत्यु पर ईसाईयों के विचार इतिहास पर आधारित है ।

ईसाई धर्म, इतिहास में परमेश्वर के काम पर आधारित है । ईसाइयों की विचारधारा और परमेश्वर के बनायी हुई दुनिया में उसके किये गए कामों के बीच एक संबंध है ।

क्रिश्चियन जे. ग्रेशम माचेन ने लिखा:

प्रारंभिक कलिशिया न केवल यीशु की कही गई बातों पर, बल्कि मुख्यतर यीशु के किये गए कामों से भी सरोकार रखता था । एक घटना के ऐलान के द्वारा दुनिया का छुटकारा होना था । और उस घटना के साथ घटना का मतलब भी निकल आया; और उस घटना के अर्थ के साथ उसकी स्थापना ही वह सिद्धांत था । ये दो तत्व हमेशा ईसाई संदेश में जुड़े होते हैं । तथ्यों का वर्णन इतिहास होता है; तथ्यों के अर्थ के साथ तथ्यों का वर्णन सिद्धांत होता है । “पोंटियस पिलातुस के अघीन पीड़ित हुआ, सूली पर चढ़ाया गया, मारा गया और गाडा गया” – यही इतिहास है । “उसने मुझे प्रेम किया और खुद को मेरे लिए कुर्बान किया” – यह सिद्धांत है । यह प्रारंभिक कलिशिया की ईसाईयत थी । 1Christianity and Liberalism, 25,26

मसिहि विचारधारा और इतिहास के बीच का रीशता इसलिए जरुरी है क्योंकि सैंकडों मुसलमान सूली पर यीशु की मृत्यु की ऐतिहासिक घटना को नकारते हैं ।2विश्वास (चमत्कार की असंभवता के बारे में धर्मनिरपेक्ष मान्यताओं सहित) ऐतिहासिक घटनाओं की सच्चाई या झूठ को स्थापित नहीं करता । बल्कि, हिब्रू-ईसाई आस्था “इस्राइल के पुराने और नए अनुभवों से उत्पन्न हुई, जिसमें परमेश्वर ने खुद की पहचान करायी । यह तथ्य ईसाई धर्म को एक ख़ास विषय वस्तु और वस्तुनिष्ठता देता है जो इसे दूसरों धर्मो से अलग करता है “(जॉर्ज एल्डन लाद)।
अब्राहमिक धर्मों से जुडे यहूदी धर्म और ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच एक प्रमुख अंतर यह है कि इस्लाम इतिहास में परमेश्वर के कार्य से जुडा नही है । इससे मेरा तात्पर्य यह है कि इस्लाम पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के बयान और उसके जीवन और मुहम्मद द्वारा सदियों पहले हुई घटनायों पर उनके द्वारा किए दावों पर आधारित है । इस घातक पतन को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता । कुछ मुसलमानों ने यह दावा करते हुए इस्लाम को इन घातक त्रुटियों से फिर से जीवित करने की असफल कोशिशें कि हैं कि पिछले प्रकाशन मिलावटी हैं । सच्चाई यह है कि एक ही आदमी के बयान पर इस्लाम की निर्भरता काल्पनिक है और अब्राहमिक धर्म का एक भ्रष्टाचार है।

करोड़ों मुसलमान सूली पर यीशु की मृत्यु से इंकार करते हैं ।

सूली पर यीशु की मौत के बारे में कुरान दावा करता है:

157और उनका यह कहना (घमंड में) कि, “हमने मरियम के बेटे ईसा (यीशु) अल्लाह का संदेशवाहक को मार डाला,” – लेकिन उन्होंने न तो उसे मारा, और न ही उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि ईसा (यीशु) के हमशक्ल को चढ़ाया गया (और उन्होने उस आदमी को मार दिया), और जो इसमें सहमत नही हैं वे लोग संदेह से भरे हुए हैं । उनके पास (निश्चित) ज्ञान नहीं है, और वह केवल अनुमान लगाके चललते हैं । यक़ीनन: उन्होंने ईसा (यीशु), मरियम के बेटे को नहीं मारा, बल्कि अल्लाह ने उसे [ईसा (यीशु)] को (उसके शरीर और आत्मा के साथ) अपने अंदर उठा लिया (और वह स्वर्ग में है) । और अल्लाह हमेशा सर्वशक्तिमान, सर्वबुद्धिमान है। (अन-निसा 4:157-158)3कुरान 4: 157 ही कुरान में एकमात्र आयत है जो यीशु को सूली पर चढ़ाने का उल्लेख करती है जिसका अनुवाद करके मुसलमानों ने यह अर्थ निकाला है कि यीशु सूली पर नहीं मरे थे ।

इब्न अब्बास (d.68/687) मुहम्मद के चचेरे भाई और जिसे कई मुसलमानों द्वारा “कुरान व्याख्या के पिता” और “ज्ञान के महासागर” के रूप में सम्मानित किया गया उसने कुरान 4: 157-158 पर टिप्पणी की थी

(और अनके कहने के कारण: हमने मरियम के पुत्र, अल्लाह के संदेशवाहक ईसा मसीह को मारा) अल्लाह ने उनके आदमी तातियनोस [एक रोमन सैनिक] को खत्म कर दिया । (उन्होंने उसे न तो मारा और न ही उसे सूली पर चढ़ाया, लेकिन उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ) अल्लाह ने तातियनोस को देखने मे यीशु की तरह बनाया और इसलिए उन्होंने उसके [यीशु] बदले उसे [तातियन] मार डाला; (और देखो! जो लोग इससे असहमत हैं) उसकी हत्या के बारे (शंका में हैं); (उन्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है बस अंदाजा है) अंदाज़ भी नहीं; (उन्होंने पक्का उसे नहीं मारा) यानी निश्चित रूप से उन्होंने उसे नहीं मारा। (बल्कि अल्लाह ने उसे स्वर्ग में ले लिया) । अपने दुश्मनों के खिलाफ प्रतिशोध में (अल्लाह हमेशा महान था), (समझदार) अपने दोस्तों को विजय प्रदान करने मे: उसने अपने पैगंबर को बचाया और उनके आदमी को नष्ट कर दिया था। (तफसीर इब्न अब्बास Mokrane Guezzou द्वारा अनुवादित)

व्याख्याता अल-बेदावी (d.685 / 1282), एक उत्तम इस्लामिक अनुवाद का अच्छा उदाहरण, सूली पर चढ़ाये जाने के बारे में लिखा:

एक कहानी के मुताबिक यहूदियों के एक समूह ने यीशु और उसकी मां का अपमान किया, जिसके बाद उसने परमेश्वर से उनके खिलाफ अपील की । जब परमेश्वर ने उनको [जिन्होंने उनका अपमान किया था] बंदरों और सूअर में बदल दिया, तो यहूदियों ने यीशु को मारने के लिए सलाह ली । तब परमेश्वर ने यीशु से कहा कि वह उसे स्वर्ग में उठा लेगा, और इसलिए यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: “तुम में से कौन मेरे जैसा रूप लेने के लिए और मेरी जगह [मरने] के लिए तैयार है और सूली पर चढ़े और फिर [सीधे] परलोक जाए ?” उनमें से एक व्यक्ति ने खुद को प्रस्तुत किया, इसलिए परमेश्वर ने उसे यीशु के समान रूप में बदल दिया और उसे मारकर सूली पर चढ़ाया गया था। दूसरों का कहना है कि एक व्यक्ति ने यीशु की मौजूदगी में [एक अनुयायी होने का] ढोंग किया लेकिन फिर चला गया और उसने उसकी निंदा की, जिसके बाद परमेश्वर ने उस व्यक्ति को यीशु के जैसा बना दिया, और उसे पकड़ लिया गया और सूली पर चढ़ाया गया था । 4Francis E. Peters, Judaism, Christianity, and Islam: The Classical Texts and Their Interpretation, vol. 1, From Covenant to Community, chap.3, no.30 में अनुवादित [Princeton: Princeton University Press, 1990], 151

इस्लाम का यीशु के सूली पर मृत्यु से इंकार करना इतिहास की एक मौलिक पुनर्व्याख्या है

यीशु के सूली पर मृत्यु से इस्लाम का इंकार इतिहास का एक मौलिक पुनर्व्याख्या है 5इस्लाम की कुछ शाखाओं का तर्क है कि कुरान ने यीशु के सूली पर मरने से इन्कार नहीं किया है: “कुछ फलासिफा और कुछ इस्माइली व्याख्याताओं ने इस मार्ग की व्याख्या की है: यहूदियों का इरादा यीशु के व्यक्ति को पूरी तरह से नष्ट करना था; असल में उन्होंने केवल उनकी नासुत [मानवता] को सूली पर चढ़ाया, उनकी लहुत [दैविकता] जीवित रही; cf. L. Massignon, Le Christ dans les Évangilesselon Ghazali, in REI, 1932, 523-36, जोRasa’il Ikhwan al-Safa(ed. Bombay, iv, 115), अबू हातिम अल-रज़ी (लगभग 934) का एक अंश, और इस्माइली मुय्यद विरजी (1077) के दूसरे पाठ का हवाला देता है । लेकिन इस व्याख्या को आम तौर पर स्वीकार नहीं किया गया था और यह कहा जा सकता है कि सूली पर यीशु की मृत्यु [यीशु का सूली पर मरने] से इंकार करने में यह एकमत है । इसके अलावा, यह इंकारना कुरान के तर्क से पूरी तरह सहमत है । (Anawati, G.C. “Isa.”, in The Encyclopaedia of Islam, E. J. Brill, Leiden, CD-ROM version) अल्प संख्या मे कुछ मुसलमान जो यह मानते हैं कि यीशु की मृत्यु सूली पर हुई, पाप के प्रायश्चित के संदर्भ में यीशु की मृत्यु के अर्थ की व्याख्या नहीं करते हैं । न ही वे विश्वास करते हैं कि सप्ताह के पहले दिन यीशु का पुनरुत्थान हमारे धार्मिकता के लिए हुआ । (रोमियो 4:25; 1 कुरिन्थियों 15:3-4). शिया इस्माइल के बारे में अधिक जानने के लिए खलील अंदानी देखें, “They Killed Him Not: The Crucifixion in Shi‘a Isma‘ili Islam.”

पूजा की मुद्रा में एक व्यक्ति की तस्वीर लेकिन उसका सिर रेत में दबा हुआ है।
जब कोई आदमी सच्चाइयों को नहीं मानता तो क्या वह इस बारे में देख, सुन और सीख सकता है जो परमेश्वर ने अपनी बनायी हुइ दुनिया में क्या किया है?

गोलगोथा में सदियों पहले जो हुआ, उसे सिखने में निरीक्षण, गवाह, गवाही और मानव विश्लेषण की बहुत कम या कोई भूमिका नहीं है । केवल एक चीज जो अंत में मायने रखती है वह यह है कि मुहम्मद ने दावा किया था कि एक स्वर्गदूत ने भूतकाल के बारे में ऐसा खुलासा किया था जो देखी और दर्ज की गई घटनाओं से विपरित था । यह सब इस तथ्य के बावजूद है कि मुहम्मद घटना के सैकड़ों साल बाद आए, सैकड़ों मील दूर रहे, और कोई सबूत नहीं दिया । इतिहास को नकारने का दुखद परिणाम होता है जैसा कि उन लोगों के साथ देखा जा सकता है जो होलोकॉस्ट से इंकार करते हैं ।

सूली पर यीशु की मृत्यु के ऐतिहासिक तथ्य

पुराने पैगम्बरों ने यीशु की मृत्यु और दफनाने की गवाही दी थी।

यशायाह ने यीशु से लगभग 700 साल पहले लिखा था:

यशायाह 53:7-9
उस पर अत्याचार किया गया और उसे पीड़ित किया गया, फिर भी उसने अपना मुँह नहीं खोला;, वह क़त्ल करने के लिए ले जाये जाने वाले एक मेमने की तरह चुप रहा, और एक भेड़ की तरह उसके बाल काटने वाले के सामने चुप रहा, इसलिए उसने अपना मुंह नहीं खोला ।
उसे अत्याचार और फैसले के तहत ले जाया गया; और उनकी पीढ़ी के लिए, जिसने मानती थी कि वह जीवित लोगों की भूमि से कट गया था, मेरे लोगों के लिए, जिनके लिए आघात बाकी था?
उसकी कब्र को दुष्ट लोगों के साथ ठहराई गई, फिर भी वह अपनी मौत के समय धनवान का संगी हुआ, यदापि उसने किसी प्रकार का उपद्रव नहीं किया था, और ना उसके मुंह से कोई छल कि बात निकली थी ।

यीशु ने कई मौकों पर अपनी मृत्यु की गवाही दी।

मैथ्यू 16:21
उस समय से यीशु अपने चेलों को बताने लगगा कि अवश्य है कि मै यरूशलेम को जाऊं और प्राचीनों, मुख्य याजकों और शास्त्रियों के द्वारा बहुत दुख उठाऊं और मार डाला जाऊं और
तीसरे दिन जिलीया जाऊं ।

मैथ्यू 20: 17-19
जब यीशु यरूशलेम जाने को था, तो बारह चेलों को एकान्त मे ले जाकर मार्ग मे उनसे कहहने लगा, “देखो, हम यरूशलेम जा रहे हैं । मनुष्य का पुत्र मुख्य याजकों और शास्त्रियों के हाथ पकड़वाया जाएगा, और वे उसे मृत्यु दण्ड के योग्य ठहराएंगे । वे उसे गैर यहूदियों के हाथों में सौंपेंगें के उसका उपहास करें, कोड़े मारें, उसे क्रूस पर चढ़ाएं, और तीसरे दिन वह जिलाया जाएगा”

मैथ्यू 26: 1-2
ऐसा हुआ कि जब यीशु यह सब बातें कह चुका, तो उसने अपने शिष्यों से कहा, “तुम जानते हो ककि दो दिन के बाद फसह का पर्व आ रहा है और मनुष्य का पुत्र क्रूस पर चढ़ाया जाएगा ।”

मैथ्यू 26: 6-12
जब यीशु बैतनिय्याह में शमौन कोढ़ी के घर मे था, तो एक स्त्री संगमरमर के पात्र में बहुत वहुमूल्य इत्र लेकर उसके पास आई, और जब वह भोजन करने बैठा तो उसे उसके सर पर उड़ेल दिया । परन्तु चेले यह देखकर क्रोधित हुए और कहने लगे, “यह बर्बादी क्यों? इस इत्र को ऊँचे दाम में बेचकर कंगालों को पैसा दिया जा सकता था?” यह जानकर यीशु ने उनसे कहा, “तुम इस स्त्री को क्यों परेशान करते हो? क्या इसलिये कि उसने मेरे साथ भलाई कि है? कंगाल तो तुम्हारे साथ सदा रहते हैं, पर मैं तुम्हारे साथ सदा न रहूँगा । जब उसने मेरी देह यह इत्र उंडेला तो इसलिए उंडेला कि मेरे गाड़े जाने के लिए मुझे तैयार करे ।

क्रूस पर यीशु की मृत्यु के चश्मदीद गवाह:

  • मरियम मगदलीनी
  • याकूब और यूसुफ की माँ मरियम
  • यीशु की माँ मरियम
  • वह चेला जिस से यीशु प्रेम करता था (यूहन्ना 19:26)

जिन लोगों ने यीशु के शव को दफनाने में भाग लिया था:

  • अरिमथिया के यूसुफ
  • निकुदेमुस
  • मरियम मगदलीनी
  • याकूब और यूसुफ की माँ मरियम

गैर-ईसाई स्रोतों ने यीशु की मृत्यु के बारे में लिखा:

  • जोसेफस (यहूदी इतिहासकार ईस्वी सन् 37 के आसपास पैदा हुए और ईस्वी सन् 100 में मर गए) यीशु की मृत्यु का हवाला देते हैं (Antiquities 18.3.3)6पाठ में लिखा है, “जब पिलातुस ने हमारे बीच के प्रमुख पुरुषों के सुझाव पर, उसे सूली पर चढ़ाया था…” इस अंश को Testimonium Flavianum कहा जाता है, जो कि विवादित है, और इसे पूरी तरह से जोसेफस के मूल रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए । हालांकि, प्रसिद्ध विद्वान जॉन पी. मियर और जोसेफ क्लासनर ने यीशु के सूली पर चढ़ाए जाने के संदर्भ को प्रामाणिक माना है।
  • टैकिटस (55-120 ईस्वी), प्राचीन रोम के एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने ईस्वी सन् 115 के आसपास लिखा था कि ईसा मसीह को पिलातुस द्वारा “मारा” गया था (Annals 15.44).7मुसलमान कभी-कभी जोसेफस और टैकिटस की प्रामाणिकता या प्रासंगिकता को अस्वीकार करते हैं । लेकिन क्या वे अपने संस्करण के ऐतिहासिक प्रमाण देने में सक्षम हैं कि क्या हुआ था?

कई चश्मदीदों ने यीशु के पुनरूत्थान को देखा:8पुनरुत्थान का मतलब किसी व्यक्ति को मरने के बाद फिर से खड़े/जीवित देखना है।

यीशु ने जो कुछ किया और सिखाया उसकी गवाही देने के लिए चेलों (प्रेरितों) को चुना था। पतरस, यीशु के सबसे प्रमुख चेलों में से एक था । पतरस यीशु के पुनरुत्थान और उसके स्वर्गारोहण का चश्मदीद गवाह था । पतरस ने प्रचार किया,

इसी यीशु को परमेश्वर ने र्जवित किया जिसके हम सब साक्षी हैं । इससलिये परमेश्वर के दाहिने हाथ पर सर्वोच्च पद पाकर और पिता से पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा प्राप्त करके, उसने उसे उण्डेल दिया जिसे तुम देखते और सुनते भी हो । क्योंकि दाऊद तो स्वयं स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, परन्तु वह आप ही कहता है: ‘प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा: मेरे दाहिने बैठ जबतक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे चरणों की चौकी न बना दूं । “इसलिए इस्राएल का सम्पूर्ण घराना निस्यच जान ले कि परमेश्वर ने उसे प्रभु और मसीह दोनो की ठहराया – इसी यीशु को जिसे तुमने क्रूस पर चढ़ाया ।“ (प्रेरितों के काम 2:32-36)

प्रेरित पतरस ने क्रूस पर चढ़ाये जाने के बाद यीशु को देखा था ।9गैर-ईसाई – विद्वान जो यीशु के चमत्कारों या उनके कुंवारे जन्म को नहीं मानते हैं – जो बाइबिल के अध्ययन के विशेषज्ञ हैं तेजी से इस निष्कर्ष पर आ रहे हैं,
“यह ऐतिहासिक रूप से पक्का माना जा सकता है कि पतरस और अन्य चेलों को यीशु की मृत्यु के बाद ऐसे अनुभव हुए थे जिनमें यीशु उन्हें पुन्हजिवित मसीह के रूप में दिखाई दिए थे” (Gerd Lüdemann, “What Really Happened to Jesus”, p.80.)
एक अज्ञेयवाद प्रोफेसर बार्ट एहरमन ने लिखा, “क्यों, तब, कुछ शिष्यों ने यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद उसे जीवित देखने का दावा किया था? मुझे बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि कुछ शिष्यों ने यह दावा किया है … पच्चीस साल बाद लिख रहे पॉल ने संकेत दिया कि यह वही है जीन्होंने दावा किया था, और मुझे नहीं लगता कि वह झूठ बोल रहे हैं । और वह उनमें से कम से कम कुछ को जानता था, जिनसे वह घटना के तीन साल बाद मिला था।”
गैरी हैबरमास के अनुसार, विद्वानों के शोध की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो गर्ड लुडमैन और बार्ट एहरमन के समान निष्कर्ष पर आ रही है । अधिक जानने के लिए, गैरी हैबरमास के प्रकाशनों का सर्वेक्षण देखें Resurrection Research from 1975 to the Present: What are the Critical Scholars Saying?

यूहन्ना दूसरा चेला था जिसे यीशु ने अपने काम और शीक्षा के गवाह और प्रमाण के लिए चुना था । यूहन्ना ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान की गवाही दी,

हम प्रेम को इसी से जानते हैं, कि उसने हमारे लिए, अपना प्राण दे दिया । अतः हमें भी भाइयों के लिए अपने प्राण देना चाहिए । (1 यूहन्ना 3:16)

क्रूस पर यीशु की मृत्यु और पुनरूत्थान के बारे में गवाही पर विश्वास करना मूसा के नियम की कानूनी आवश्यकता है ।

तौरेत/कानून के मुताबिक यह जरूरी है कि किसी मामले को दो या तीन गवाहों द्वारा साबित किया जाए (व्यवस्था विवरण 17:6-7) । यीशु के पुनरूत्थान के सैकड़ों गवाह मौजूद थे (1 कुरिन्थियों 15:1-8)। इसलिए, यीशु के विषय मे गवाही, पुराने पैगम्बरों, यीशु के अनुयायियों, गैर-ईसाई इतिहासकारों, आदि की गवाही सत्य है, कानूनी है और उस पर विश्वास किया जाना चाहिए ।

सूली पर चढ़ाने के दौरान क्या हुआ और यीशु के अनुयायियों ने सूली पर यीशु की मृत्यु और पुनरूत्थानकी गवाही क्यों दी, इस बारे में कुरान और इसके अनुयायी अनिश्चित हैं ।

हालांकि यह यकीन का दावा करता है, एन-नीसा 4: 157 एक ऐतिहासिक दावा है जो ऐतिहासिक सच्चाई से दूर है:

004.157
157और उन्होने कहा (घमंड में) कि, “हमने मरियम के बेटे ईसा (यीशु) अल्लाह के दूत को मार डाला,” लेकिन उन्होंने न उसे मारा, और न ही उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि उन्हे ऐसा प्रतीत हुआ, और जो इसमें विश्वास नहीं करते वह पूरी तरह धोखे में हैं, न्हें किसी तरह का (निश्चित) ज्ञान नहीं है, और उनकी सोच केवल कल्पनीक है, और वास्तव मे उन्होने उसे नही मारा ।

यह दावा सच्चाई नहीं है । यह दावा घटना के सैकड़ों साल बाद किया गया था और पहली शताब्दी से इसका कोई ऐतिहासिक समर्थन नहीं है; यीशु के अनुयायियों में से किसी ने भी नहीं लिखा न ऐसी गवाही दी कि ऐसा प्रतीत हुआ की यीशु सूली पर चढ़कर मरा । कुरान यह नहीं समझाती है कि सूली पर कौन मरा था, यह नहीं समझाती है कि क्या यीशु के शिष्यों को धोखा दिया गया था, और यह नहीं समझाती है कि अल्लाह ने इस बारे में सैकड़ों वर्षों तक दुनिया को धोखा देने की इजाजत क्यों दी है (या अल्लाह ने दुनिया को धोखा दिया है?)। ये मुस्लिम हैं जो अटकलें लगाते हैं; जिन्हें कोई ठोस खबर नहीं है; और वे धोखे से भरे हैं कि असल में सूली पर चढ़ाने के दौरान क्या हुआ था । सभी ईसाई (रोमन कैथोलिक, रूढ़िवादी, और प्रोटेस्टेंट) इस बात से सहमत हैं कि यीशु की मृत्यु सूली पर हुई थी । यह सुनिश्चित है कि ईसाई सब बातों पर सहमत नहीं हैं । यहाँ बहुत सी बातें हैं जिन पर हम असहमत हैं । लेकिन एक बात जो सभी ईसाई मानते हैं, वह है सूली पर यीशु की मृत्यु । यहां तक कि गैर-ईसाई इतिहासकार भी इसे मानते हैं ।10“इतिहास की एक सच्चाई यह है कि यीशु को यहूदिया, रोमन प्रान्त के पोंटियस पिलातूस के आदेश पर सूली पर चढ़ाया गया था (Bart Ehrman, The Historical Jesus: Lecture Transcript and Course Guidebook, Part 2 of 2 [Chantilly, VA: The Teaching Company, 2000], 162). सूली पर यीशु की मृत्यु की ऐतिहासिकता के बारे में काफी सहमति है।11यह महत्वपूर्ण है क्योंकि मुसलमानों को इत्तम अल-हुजाह (अरबी में “सबूत का पूरा होना”) नामक एक अवधारणा में विश्वास है । इत्तम अल-हुजाह यह मान्यता है कि धार्मिक सत्य को अल्लाह के एक दूत द्वारा पूरी तरह से स्पष्ट किया गया है । जब सूली पर यीशु की मृत्यु की बात आती है – यीशु, शास्त्र, और इतिहास स्पष्ट हैं । यदि मुहम्मद अल्लाह के पैगम्बर थे, तो उन्होंने सूली पर यीशु की मृत्यु की ऐतिहासिक घटना से इंकार करके निश्चित रूप से स्पष्टता या “प्रमाण की संपूर्णता” नहीं दिया । सूली पर चढ़ने के दौरान सच में जो कुछ हुआ था उसके बारे में मोहम्मद की स्पष्टता में कमी और मुस्लिम भ्रम, वह इस बात का प्रमाण है कि मुहम्मद अल्लाह के दूत नहीं थे ।

इसे सीधे शब्दों में कहें तो मूसा का कानून इसे नाजायज, गैरकानूनी बनाता है और इसलिए कुरान पर विश्वास करना पाप है ।

 बाइबल, कुरान और न्यायाधीश के हथोड़े की तीन तस्वीरें
सूली पर यीशु की मृत्यु और पुनरूत्थान के प्रमाण और तथ्य आपके सामने हैं । आपको तथ्यों के आधार पर एक नयायपुर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता है ।

ईश्वर के कार्यों को नकारना केवल अनैतिक नहीं है। यह तर्कहीन है।

जब दुनिया के बारे में किसी व्यक्ति का विश्वास असली दुनिया के अनुसार नहीं होता है तो गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं । एक मानसिक रोगी के बारे में कहानी बताई गई है जो इस बात पर जोर देता रहा कि वह मर चुका है । डॉक्टरों ने उसे लगातार समझाने की कोशिश की कि वह जीवित है और मरा नहीं है लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली ।

अंत में, उसे वैज्ञानिक रूप से यह समझाकर साबित करने का निर्णय लिया गया कि मरे हुए लोगों से खून नहीं बहता है, केवल जिन्दा लोगों से खून बहता है । चीर-फाड़ देखने के बाद, संचार प्रणाली के काम करने के बारे में सुनने के बाद, और मेडिकल किताबों को पढ़ने के बाद, मनोरोगी ने आखिरकार कबूल किया, “ठीक है, मुझे लगता है कि केवल जिन्दा लोगों का खून बहता है ।”

जैसे ही रोगी ने इस सच्चाई को स्वीकार किया, डॉक्टरों में से एक ने एक सुई निकाली और उसे मनोरोगी रोगी की नसों में घोंप दिया । डॉक्टरों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, “तुम्हारा खून बह रहा है! इसका क्या मतलब है?”

मनोरोगी ने अपने खून बहते हाथ को देखा और कहा, “मरे हुए लोगों में भी खून बहता है!”

मनोरोगी के दिमाग के अनुसार: वह मृत था। लेकिन उसके दिमाग में जो था वह सच नहीं था ।12इस कहानी को जॉन वारविक मोंटगोमरी, क्रिश्चियन धर्मशास्त्र की आत्महत्या 122 में “ईश्वर की मृत्यु, ‘की मृत्यु” से लिया गया है ।. डॉ. मोंटगोमरी का कहना है कि “यदि आप काफी दृढ़ता के साथ गलत धारणा रखते हैं, तो आपको तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

इस्लाम में भी एक ऐसी ही समस्या है । इसका दावा कि यीशु सूली पर नहीं मरे सत्यता के परे है । यह इतिहास से मेल नहीं खाती । इतिहास मायने रखता है क्योंकि इतिहास में होने वाली घटनाएं हर किसी के लिए सच होती हैं:

वे [ईसाई धर्म सिद्धांत से संबंधित घटनाएँ] सत्य थीं, क्योंकि वे इतिहास में घटी थीं, और इतिहास में होने वाली बातें प्रत्यक्ष प्रतिभागियों के लिए ही सही नहीं हैं, बल्कि सभी के लिए सत्य हैं 13Michael Horton, “Heaven Came Down”; Modern Reformation, Nov./Dec. 1995, Vol. 4 No. 6.

यीशु की मृत्यु और पुनरूत्थान सभी लोगों के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि हम सभी मरेंगे । यीशु मरे हुओं में से जी उठे और आप उन पर विश्वास करके हमेशा जीवित रह सकते हैं,

रोमियों 10: 9
कि यदि तू अपने मुख से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन में यह विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मृतकों में से जीवित किया है, तो तू उद्धार पायेगा ।

मैं आपको सच्चाई और उद्धार के एकमात्र मार्ग के रूप में ईसाई धर्म को अपनाने के लिए आमंत्रित करता हूं । यीशु ने कहा, “इसलिये मैंने तुमसे कहा कि तुम अपने पापों में मरोगे, क्योंकि जब तक तुम विश्वास न करो कि मैं वही हूँ, तुम अपने पापों में मरोगे” (यूहन्ना 8:24)।

धर्म के बारे में एक दूसरे के साथ बात करते हुए दो लोगों (एक मुस्लिम और एक ईसाई) की तस्वीर।

यदि आपके कोई प्रश्न हैं या आप मुझसे बात करना चाहते हैं तो कृपया मुझसे संपर्क करें

यीशु पर विश्वास करो, और अपने पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा लो, और तुम निश्चित हो सकते हो कि तुम्हें अनंत जीवन मिलेगा । यह निश्चितता से यीशु की मृत्यु, उसका गाड़ा जाना, पुनरूत्थान और स्वर्गारोहण के संबंध में परमेश्वर ने वास्तविक दुनिया में जो कुछ किया है, उसपर जड़ित हैं ।

कुरान और यीशू का सूली पर चढ़ाया जाना देखें

 

क्या आप एक अहमदिया मुसलमान हैं? यदि ऐसा है, तो आप मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद के बारे में अधिक जानकारी इस लेख से पा सकते हैं:

मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद

References   [ + ]

1. Christianity and Liberalism, 25,26
2. विश्वास (चमत्कार की असंभवता के बारे में धर्मनिरपेक्ष मान्यताओं सहित) ऐतिहासिक घटनाओं की सच्चाई या झूठ को स्थापित नहीं करता । बल्कि, हिब्रू-ईसाई आस्था “इस्राइल के पुराने और नए अनुभवों से उत्पन्न हुई, जिसमें परमेश्वर ने खुद की पहचान करायी । यह तथ्य ईसाई धर्म को एक ख़ास विषय वस्तु और वस्तुनिष्ठता देता है जो इसे दूसरों धर्मो से अलग करता है “(जॉर्ज एल्डन लाद)।
अब्राहमिक धर्मों से जुडे यहूदी धर्म और ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच एक प्रमुख अंतर यह है कि इस्लाम इतिहास में परमेश्वर के कार्य से जुडा नही है । इससे मेरा तात्पर्य यह है कि इस्लाम पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के बयान और उसके जीवन और मुहम्मद द्वारा सदियों पहले हुई घटनायों पर उनके द्वारा किए दावों पर आधारित है । इस घातक पतन को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता । कुछ मुसलमानों ने यह दावा करते हुए इस्लाम को इन घातक त्रुटियों से फिर से जीवित करने की असफल कोशिशें कि हैं कि पिछले प्रकाशन मिलावटी हैं । सच्चाई यह है कि एक ही आदमी के बयान पर इस्लाम की निर्भरता काल्पनिक है और अब्राहमिक धर्म का एक भ्रष्टाचार है।
3. कुरान 4: 157 ही कुरान में एकमात्र आयत है जो यीशु को सूली पर चढ़ाने का उल्लेख करती है जिसका अनुवाद करके मुसलमानों ने यह अर्थ निकाला है कि यीशु सूली पर नहीं मरे थे ।
4. Francis E. Peters, Judaism, Christianity, and Islam: The Classical Texts and Their Interpretation, vol. 1, From Covenant to Community, chap.3, no.30 में अनुवादित [Princeton: Princeton University Press, 1990], 151
5. इस्लाम की कुछ शाखाओं का तर्क है कि कुरान ने यीशु के सूली पर मरने से इन्कार नहीं किया है: “कुछ फलासिफा और कुछ इस्माइली व्याख्याताओं ने इस मार्ग की व्याख्या की है: यहूदियों का इरादा यीशु के व्यक्ति को पूरी तरह से नष्ट करना था; असल में उन्होंने केवल उनकी नासुत [मानवता] को सूली पर चढ़ाया, उनकी लहुत [दैविकता] जीवित रही; cf. L. Massignon, Le Christ dans les Évangilesselon Ghazali, in REI, 1932, 523-36, जोRasa’il Ikhwan al-Safa(ed. Bombay, iv, 115), अबू हातिम अल-रज़ी (लगभग 934) का एक अंश, और इस्माइली मुय्यद विरजी (1077) के दूसरे पाठ का हवाला देता है । लेकिन इस व्याख्या को आम तौर पर स्वीकार नहीं किया गया था और यह कहा जा सकता है कि सूली पर यीशु की मृत्यु [यीशु का सूली पर मरने] से इंकार करने में यह एकमत है । इसके अलावा, यह इंकारना कुरान के तर्क से पूरी तरह सहमत है । (Anawati, G.C. “Isa.”, in The Encyclopaedia of Islam, E. J. Brill, Leiden, CD-ROM version) अल्प संख्या मे कुछ मुसलमान जो यह मानते हैं कि यीशु की मृत्यु सूली पर हुई, पाप के प्रायश्चित के संदर्भ में यीशु की मृत्यु के अर्थ की व्याख्या नहीं करते हैं । न ही वे विश्वास करते हैं कि सप्ताह के पहले दिन यीशु का पुनरुत्थान हमारे धार्मिकता के लिए हुआ । (रोमियो 4:25; 1 कुरिन्थियों 15:3-4). शिया इस्माइल के बारे में अधिक जानने के लिए खलील अंदानी देखें, “They Killed Him Not: The Crucifixion in Shi‘a Isma‘ili Islam.”
6. पाठ में लिखा है, “जब पिलातुस ने हमारे बीच के प्रमुख पुरुषों के सुझाव पर, उसे सूली पर चढ़ाया था…” इस अंश को Testimonium Flavianum कहा जाता है, जो कि विवादित है, और इसे पूरी तरह से जोसेफस के मूल रूप में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए । हालांकि, प्रसिद्ध विद्वान जॉन पी. मियर और जोसेफ क्लासनर ने यीशु के सूली पर चढ़ाए जाने के संदर्भ को प्रामाणिक माना है।
7. मुसलमान कभी-कभी जोसेफस और टैकिटस की प्रामाणिकता या प्रासंगिकता को अस्वीकार करते हैं । लेकिन क्या वे अपने संस्करण के ऐतिहासिक प्रमाण देने में सक्षम हैं कि क्या हुआ था?
8. पुनरुत्थान का मतलब किसी व्यक्ति को मरने के बाद फिर से खड़े/जीवित देखना है।
9. गैर-ईसाई – विद्वान जो यीशु के चमत्कारों या उनके कुंवारे जन्म को नहीं मानते हैं – जो बाइबिल के अध्ययन के विशेषज्ञ हैं तेजी से इस निष्कर्ष पर आ रहे हैं,
“यह ऐतिहासिक रूप से पक्का माना जा सकता है कि पतरस और अन्य चेलों को यीशु की मृत्यु के बाद ऐसे अनुभव हुए थे जिनमें यीशु उन्हें पुन्हजिवित मसीह के रूप में दिखाई दिए थे” (Gerd Lüdemann, “What Really Happened to Jesus”, p.80.)
एक अज्ञेयवाद प्रोफेसर बार्ट एहरमन ने लिखा, “क्यों, तब, कुछ शिष्यों ने यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने के बाद उसे जीवित देखने का दावा किया था? मुझे बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि कुछ शिष्यों ने यह दावा किया है … पच्चीस साल बाद लिख रहे पॉल ने संकेत दिया कि यह वही है जीन्होंने दावा किया था, और मुझे नहीं लगता कि वह झूठ बोल रहे हैं । और वह उनमें से कम से कम कुछ को जानता था, जिनसे वह घटना के तीन साल बाद मिला था।”
गैरी हैबरमास के अनुसार, विद्वानों के शोध की प्रवृत्ति बढ़ रही है जो गर्ड लुडमैन और बार्ट एहरमन के समान निष्कर्ष पर आ रही है । अधिक जानने के लिए, गैरी हैबरमास के प्रकाशनों का सर्वेक्षण देखें Resurrection Research from 1975 to the Present: What are the Critical Scholars Saying?
10. “इतिहास की एक सच्चाई यह है कि यीशु को यहूदिया, रोमन प्रान्त के पोंटियस पिलातूस के आदेश पर सूली पर चढ़ाया गया था (Bart Ehrman, The Historical Jesus: Lecture Transcript and Course Guidebook, Part 2 of 2 [Chantilly, VA: The Teaching Company, 2000], 162).
11. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि मुसलमानों को इत्तम अल-हुजाह (अरबी में “सबूत का पूरा होना”) नामक एक अवधारणा में विश्वास है । इत्तम अल-हुजाह यह मान्यता है कि धार्मिक सत्य को अल्लाह के एक दूत द्वारा पूरी तरह से स्पष्ट किया गया है । जब सूली पर यीशु की मृत्यु की बात आती है – यीशु, शास्त्र, और इतिहास स्पष्ट हैं । यदि मुहम्मद अल्लाह के पैगम्बर थे, तो उन्होंने सूली पर यीशु की मृत्यु की ऐतिहासिक घटना से इंकार करके निश्चित रूप से स्पष्टता या “प्रमाण की संपूर्णता” नहीं दिया । सूली पर चढ़ने के दौरान सच में जो कुछ हुआ था उसके बारे में मोहम्मद की स्पष्टता में कमी और मुस्लिम भ्रम, वह इस बात का प्रमाण है कि मुहम्मद अल्लाह के दूत नहीं थे ।
12. इस कहानी को जॉन वारविक मोंटगोमरी, क्रिश्चियन धर्मशास्त्र की आत्महत्या 122 में “ईश्वर की मृत्यु, ‘की मृत्यु” से लिया गया है ।. डॉ. मोंटगोमरी का कहना है कि “यदि आप काफी दृढ़ता के साथ गलत धारणा रखते हैं, तो आपको तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
13. Michael Horton, “Heaven Came Down”; Modern Reformation, Nov./Dec. 1995, Vol. 4 No. 6